http://www.livehindustan.com/news/location/rajwarkhabre/article1-story-39-0-336943.html&locatiopnvalue=1
http://www.ijpm.info/article.asp?issn=0253-7176;year=2013;volume=35;issue=1;spage=39;epage=46;aulast=Mathew
कम उम्र में बढ़ रहा है तनाव का दायरा
News story by Nishi Bhat, Hindustan daily
बचपन तनाव के घेरे में है। कभी अच्छे नंबर लाने की चिंता तो कभी परिस्थितियों से सामंजस्य न बना पाने की। बच्चों में तनाव के बढ़ते प्रतिशत को लेकर एक अध्ययन किया गया। जिसमें 6 से 16 साल तक के बच्चों को शामिल किया गया। पाया गया कि तनाव से न उबर पाने की स्थिति में बच्चों मौत को गले लगाने का प्रयास किया।
मनोचिकित्सक डॉ. ओमप्रकाश बच्चों में तनाव की स्थिति को माता पिता भी नहीं पहचान पाते। इंडियन साइके ट्री एसोसिएशन द्वारा किए गए अध्यन में 6 से 16 साल की उम्र के 48 प्रतिशत बच्चों को तनाव का शिकार पाया गया। जिसमें 20 प्रतिशत ने 15 साल की उम्र से पहले आत्महत्या की कोशशि की। तनाव के विभिन्न कारणों में परिस्थितियों से सामंजस्य न बना पाने को सबसे अहम कारण माना गया। देखा गया कि बच्चों परिस्थिति के अनुसार अपनी समस्या को जल्दी से माता पिता के साथ भी नहीं बांट पाते।
इंटरनेट और दोस्तों के बीच तनाव का हल खोजने की कोशशि उन्हें आत्महत्या के प्रयास का रास्ता दिखाती है। 1000 बच्चों की काउंसलिंग में 48 प्रतिशत बच्चों ने इस बात का स्वीकार किया गया कि वह घर में किसी से भी अपनी बात नहीं कर पाते हैं। तनाव का दूसरा अहम कारण डिप्रेसवि डिस्ऑर्डर को पाया गया, 16 प्रतिशत बच्चों इसका शिकार है। इसे पहले स्तर के तनाव की दूसरी अवस्था कहा जा सकता है, जबकि बच्चा खुद को दूसरों से अलग रखने लगता है।
जबकि 6 प्रतिशत बच्चों तनाव की उस स्थिति में देखे गए जबकि वह इससे उबरने के लिए इंक रिमूवर और अन्य चीजों का नशे के तौर पर इस्तेमाल करते पाए गए। अध्ययन के अनुसार 52 प्रतिशत बच्चों तनाव से मुक्ति पाने के लिए घर में रखे पेस्टिसाइड या रसायन को पीने की कोशशि करते हैं, जबकि 20 प्रतिशत ने घर में रखी पुरानी दवाएं खाने की कोशशि की। 12 प्रतिशत ने हाथ की नस काटी, जबकि अन्य में छत से कूद या फिर फांसी लगाकर जान देने की कोशशि की गई।
डॉ. ओम प्रकाश कहते हें कि दरअसल बच्चों के तनाव को खुद माता पिता भी नहीं पहचान पाते। ताकि न मुरझाए बचपन की मुस्कान-बच्चों के साथ अधिक और गुणवत्ता परक समय बिताएं -उसकी समस्याएं जानने के लिए दोस्त बनने की कोशशि करें -कशिारोवस्था में विशेष रूप से बच्चों के मन की बातें जानने की कोशशि करें -बच्चा यदि किसी हीन भावना का शिकार तो नहीं, इसके लिए उसकी आदतों पर ध्यान दें -12 से 16 साल में विपरीत सेक्स के प्रति बढ़ने वाले आकर्षण पर भी रहे सचेत और खुल कर बांटे अनुभव -बोर्ड परीक्षा या अन्य प्रतियोगी परीक्षा में यदि नहीं आए अंक बेहतर तो अन्य विकल्पों पर चर्चा करें।
http://www.ijpm.info/article.asp?issn=0253-7176;year=2013;volume=35;issue=1;spage=39;epage=46;aulast=Mathew
कम उम्र में बढ़ रहा है तनाव का दायरा
News story by Nishi Bhat, Hindustan daily
बचपन तनाव के घेरे में है। कभी अच्छे नंबर लाने की चिंता तो कभी परिस्थितियों से सामंजस्य न बना पाने की। बच्चों में तनाव के बढ़ते प्रतिशत को लेकर एक अध्ययन किया गया। जिसमें 6 से 16 साल तक के बच्चों को शामिल किया गया। पाया गया कि तनाव से न उबर पाने की स्थिति में बच्चों मौत को गले लगाने का प्रयास किया।
मनोचिकित्सक डॉ. ओमप्रकाश बच्चों में तनाव की स्थिति को माता पिता भी नहीं पहचान पाते। इंडियन साइके ट्री एसोसिएशन द्वारा किए गए अध्यन में 6 से 16 साल की उम्र के 48 प्रतिशत बच्चों को तनाव का शिकार पाया गया। जिसमें 20 प्रतिशत ने 15 साल की उम्र से पहले आत्महत्या की कोशशि की। तनाव के विभिन्न कारणों में परिस्थितियों से सामंजस्य न बना पाने को सबसे अहम कारण माना गया। देखा गया कि बच्चों परिस्थिति के अनुसार अपनी समस्या को जल्दी से माता पिता के साथ भी नहीं बांट पाते।
इंटरनेट और दोस्तों के बीच तनाव का हल खोजने की कोशशि उन्हें आत्महत्या के प्रयास का रास्ता दिखाती है। 1000 बच्चों की काउंसलिंग में 48 प्रतिशत बच्चों ने इस बात का स्वीकार किया गया कि वह घर में किसी से भी अपनी बात नहीं कर पाते हैं। तनाव का दूसरा अहम कारण डिप्रेसवि डिस्ऑर्डर को पाया गया, 16 प्रतिशत बच्चों इसका शिकार है। इसे पहले स्तर के तनाव की दूसरी अवस्था कहा जा सकता है, जबकि बच्चा खुद को दूसरों से अलग रखने लगता है।
जबकि 6 प्रतिशत बच्चों तनाव की उस स्थिति में देखे गए जबकि वह इससे उबरने के लिए इंक रिमूवर और अन्य चीजों का नशे के तौर पर इस्तेमाल करते पाए गए। अध्ययन के अनुसार 52 प्रतिशत बच्चों तनाव से मुक्ति पाने के लिए घर में रखे पेस्टिसाइड या रसायन को पीने की कोशशि करते हैं, जबकि 20 प्रतिशत ने घर में रखी पुरानी दवाएं खाने की कोशशि की। 12 प्रतिशत ने हाथ की नस काटी, जबकि अन्य में छत से कूद या फिर फांसी लगाकर जान देने की कोशशि की गई।
डॉ. ओम प्रकाश कहते हें कि दरअसल बच्चों के तनाव को खुद माता पिता भी नहीं पहचान पाते। ताकि न मुरझाए बचपन की मुस्कान-बच्चों के साथ अधिक और गुणवत्ता परक समय बिताएं -उसकी समस्याएं जानने के लिए दोस्त बनने की कोशशि करें -कशिारोवस्था में विशेष रूप से बच्चों के मन की बातें जानने की कोशशि करें -बच्चा यदि किसी हीन भावना का शिकार तो नहीं, इसके लिए उसकी आदतों पर ध्यान दें -12 से 16 साल में विपरीत सेक्स के प्रति बढ़ने वाले आकर्षण पर भी रहे सचेत और खुल कर बांटे अनुभव -बोर्ड परीक्षा या अन्य प्रतियोगी परीक्षा में यदि नहीं आए अंक बेहतर तो अन्य विकल्पों पर चर्चा करें।
No comments:
Post a Comment