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Sunday, February 10, 2013

Nursery admission in Delhi...........a big challenge.....impact on children

इंस्टीटय़ूट ऑफ हृयूमन बिहेवियर एंड एलायड साइंस के मनोचिकित्सक डॉ. ओमप्रकाश ने बताया कि प्रतिस्पर्धा कम उम्र से ही शुरू हो जाती है। पहली सीढ़ी नर्सरी एड़ाशिन ही है। यह सही है कि एडमिशन की चिंता अभिभावकों को होती है, लेकिन बेहतर स्कूल में एडमिशन न होने का असर सबसे अधिक बच्चों के मानसिक विकास पर पड़ता

नई दिल्ली, निशि भाट। मासूम बचपन के चेहरे पर चिंता की लकीरे हैं। स्कूलों की सूची निकलने के साथ ही बच्चों के दिल की धड़कनें भी बढ़ रही हैं। उम्र की पहली सीढ़ी पर मिली तनाव की यह स्थिति मानसिक स्वास्थ्य के लिए बेहतर नहीं। सबसे अहम है कि बच्चों के इस तनाव पर कभी गौर ही नहीं किया जाता। ब्रिटशि मेडिकल जर्नल के जनवरी महीने के अंक में छपे लेख के अनुसार कम उम्र में तनाव का स्तर बढ़ रहा है।


तनाव के शिकार 4-10 साल की उम्र के 40 प्रतिशत बच्चों में नर्सरी में एड़ाशिन न होने को तनाव की प्रमुख वजह पाया गया। तनाव के इस स्तर को जानने के लिए हेल्थ एंड क्लीनिकल एक्सीलेंस ने नई गाइडलाइन भी लागू करने की बात कही है। इंस्टीटय़ूट ऑफ हृयूमन बिहेवियर एंड एलायड साइंस के मनोचिकित्सक डॉ. ओमप्रकाश ने बताया कि प्रतिस्पर्धा कम उम्र से ही शुरू हो जाती है। पहली सीढ़ी नर्सरी एड़ाशिन ही है। यह सही है कि एडमिशन की चिंता अभिभावकों को होती है, लेकिन बेहतर स्कूल में एडमिशन न होने का असर सबसे अधिक बच्चों के मानसिक विकास पर पड़ता है।

जिसे परफारमेंस एंजाइटी कहा जाता है। स्कूलों द्वारा निर्धारित प्वाइंट पर यदि बच्चा अंक हासिल नहीं कर पाता तो इसमें बच्चों का दोष क्या है यह उसे कोई नहीं बताता। मनोचिकित्सक डॉ. समीर पारीख ने बताया कि दिल्ली में नर्सरी एड़ाशिन की समस्या को कभी बच्चों के नजरिए से देखा ही नहीं गया। जबकि मानसिक विकास की उस उम्र में बच्चों को नर्सरी एड़ाशिन का तनाव मिलता है जबकि वह खुद को सबसे बेहतर साबित कर सकता था। साइकोसिस, साइक्रेटिस डिसऑर्डर और एडजस्टमेंट डिसऑर्डर ऐसी समस्याएं हैं जिसे एडमिशन न हो पाने की सूरत में दूर गामी परिणाम कहा जाता है।

20 हजार के लिए तीन लाख फार्म हर साल नर्सरी में एडमिशन के लिए तीन लाख फार्म भरे जाते हैं, जबकि प्राइवेट स्कूली की नर्सरी के लिए केवल 20 हजार सीट ही हैं। इसके अलावा 2255 अपंजीकृत स्कूल हैं। बच्चों की किस्मत के लिए तीन से चार स्कूलों में बाजी लगाई जाती है। बावजूद इसके जरूरी नहीं कि सभी को प्रवेश मिल जाएं। बीते साल किसी भी स्कूल में नर्सरी एड़ाशिन न मिलने की सूरत में साकेत निवासी अशोक मेहता ने अपनी चार वर्षीय बच्ची का गाजियाबाद में एड़ाशिन कराया, बच्ची इस साल पूछती हैं पापा मैं इस साल दिल्ली में पढ़ पाऊंगी या नहीं? मुश्किल अभिभावकों का प्रश्न यह है कि बच्चों को काबिलियत साबित करने का मौका ही नहीं मिलेगा तो कुंठित होना निश्चित है।

नहीं मिला एडमिशन तो क्या विकल्प -एनसीआर के अन्य स्कूलों में मौका -सरकारी या फिर अन्य चैरिटी के स्कूल -होम क्लास में घर पर ही पढ़ाई फिर अगले साल प्रयास -अपंजीकृत स्कूल में लेते हैं मजबूरी में प्रवेश किस तरह की समस्या पर्सनेल्टी एंजाइटी- स्कूल जिस प्वाइंट पर प्रवेश देते हैं, इसमें कई बार होनहार को भी प्रवेश नहीं मिलता, और अपनी क्षमता के अनुसार यदि बच्चों को बेहतर स्कूल नहीं मिलता तो वह हीन भावना या पर्सनेल्टी डिस्आर्डर का शिकार होता है।

एडजस्टमेंट डिसऑर्डर-एक बेहतर परिवार में परवरशि पाने वाले बच्चों के लिए सामान्य तबके के स्कूल में प्रवेश मिलने पर वह वहां के परिवेश में खुद को नही ढाल पाता। हालांकि कई बार अभिभावक इसी बात को ध्यान में रखकर अगले साल प्रवेश के लिए आवेदन करते हैं। सेल्फ कांफिडेंस कम होना- साथी दोस्तों को प्रवेश मिलने और प्वाइंट कम होने पर बच्चों को प्रवेश न मिलने पर उसका आत्मवशि्वास कम होता है। मनोचिकित्सकों का कहना है कि स्कूल जो प्वाइंट निर्धारित करते हैं, उसमें यदि बच्चा खरा नहीं उतरता तो उसमें बच्चों का क्या दोष?।
http://www.livehindustan.com/news/location/rajwarkhabre/article1-story-39-0-302805.html&locatiopnvalue=4

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