A news story appeared in Hindustan daily on Indian parenting
http://m.newshunt.com/Live+Hindustan/LifeStyle/19268543/994
इहबास (इंस्टीटय़ूट ऑफ ह्यूमन बिहेवियर एंड एलाइड साइसंसेज), नई दिल्ली में मनोविज्ञान के एसो. प्रोफेसर ओम प्रकाश के मुताबिक, भारतीय परवरिश दुनिया के किसी दूसरे देशों से बिल्कुल अलग है। उनकी कुछ खास बातें हैं, जो कहीं और नहीं दिखतीं। लेकिन कुछ खामियां भी हैं, जो यहां की परवरिश पर सवालिया निशान लगा देती हैं। उम्र के साथ-साथ बच्चों के लिए अपने व्यवहार में बदलाव करें। हमारी परवरिश में इसका चलन नहीं है। अपने बच्चों के साथ जैसा हम पांच साल की उम्र में व्यवहार करते हैं, वैसा ही दस वर्ष की उम्र में और उसके उम्रदराज होने पर भी काफी हद तक हमारा रवैया वैसा ही होता है।
भारतीय परिवेश में 11 वर्ष के बाद लड़की में और 13 वर्ष के बाद लड़के में परिपक्वता आ जाती है, इसलिए इस उम्र के बाद उन्हें आत्मनिर्भर बनना सीखना चाहिए। भारतीय परवरिश में बच्चों की हमेशा माता-पिता पर निर्भरता बनी रहती है। बात चाहे छोटे-बड़े फैसले की हो या किसी कोर्स की, भारतीय बच्चे अपने माता-पिता पर पूरी तरह से निर्भर रहते हैं। निर्भरता माता-पिता और बच्चों के बीच की बॉन्डिंग को मजबूत तो करती है, मगर एक सीमा के बाद यह बच्चे को दबाने लगती है। माता-पिता या बड़ों द्वारा फैसले थोपने की प्रथा भी गलत है। सवाल करियर का हो या शादी का, हमेशा घर के बड़े अपनी मर्जी से ही फैसला करना चाहते हैं। कुछ सीमा तक यह बच्चों को सुरक्षा का एहसास दिलाती है, पर एक सीमा के बाद उनमें मनोविकार पैदा होने लगते हैं। वे बहुत ज्यादा दबाव महसूस करने लगते हैं, उनमें चिड़चिड़ापन, तनाव आने लगता है। वे प्राकृतिक रूप से अपनी पूरी काबिलियत नहीं दे पाते। इसलिए बच्चों को थोड़ा स्पेस देना जरूरी है ताकि बच्चे खुद को समझ सकें और अपनी कमजोरियों व ताकतों को पहचान सकें। बच्चों में तीन साल की उम्र से ही नैतिक मूल्य विकसित करना जरूरी है। किसी किताब या ग्रंथ की सहायता से ऐसा करना संभव नहीं है। इसके लिए माता-पिता को खुद एक रोल मॉडल की तरह काम करना होगा।
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इहबास (इंस्टीटय़ूट ऑफ ह्यूमन बिहेवियर एंड एलाइड साइसंसेज), नई दिल्ली में मनोविज्ञान के एसो. प्रोफेसर ओम प्रकाश के मुताबिक, भारतीय परवरिश दुनिया के किसी दूसरे देशों से बिल्कुल अलग है। उनकी कुछ खास बातें हैं, जो कहीं और नहीं दिखतीं। लेकिन कुछ खामियां भी हैं, जो यहां की परवरिश पर सवालिया निशान लगा देती हैं। उम्र के साथ-साथ बच्चों के लिए अपने व्यवहार में बदलाव करें। हमारी परवरिश में इसका चलन नहीं है। अपने बच्चों के साथ जैसा हम पांच साल की उम्र में व्यवहार करते हैं, वैसा ही दस वर्ष की उम्र में और उसके उम्रदराज होने पर भी काफी हद तक हमारा रवैया वैसा ही होता है।
भारतीय परिवेश में 11 वर्ष के बाद लड़की में और 13 वर्ष के बाद लड़के में परिपक्वता आ जाती है, इसलिए इस उम्र के बाद उन्हें आत्मनिर्भर बनना सीखना चाहिए। भारतीय परवरिश में बच्चों की हमेशा माता-पिता पर निर्भरता बनी रहती है। बात चाहे छोटे-बड़े फैसले की हो या किसी कोर्स की, भारतीय बच्चे अपने माता-पिता पर पूरी तरह से निर्भर रहते हैं। निर्भरता माता-पिता और बच्चों के बीच की बॉन्डिंग को मजबूत तो करती है, मगर एक सीमा के बाद यह बच्चे को दबाने लगती है। माता-पिता या बड़ों द्वारा फैसले थोपने की प्रथा भी गलत है। सवाल करियर का हो या शादी का, हमेशा घर के बड़े अपनी मर्जी से ही फैसला करना चाहते हैं। कुछ सीमा तक यह बच्चों को सुरक्षा का एहसास दिलाती है, पर एक सीमा के बाद उनमें मनोविकार पैदा होने लगते हैं। वे बहुत ज्यादा दबाव महसूस करने लगते हैं, उनमें चिड़चिड़ापन, तनाव आने लगता है। वे प्राकृतिक रूप से अपनी पूरी काबिलियत नहीं दे पाते। इसलिए बच्चों को थोड़ा स्पेस देना जरूरी है ताकि बच्चे खुद को समझ सकें और अपनी कमजोरियों व ताकतों को पहचान सकें। बच्चों में तीन साल की उम्र से ही नैतिक मूल्य विकसित करना जरूरी है। किसी किताब या ग्रंथ की सहायता से ऐसा करना संभव नहीं है। इसके लिए माता-पिता को खुद एक रोल मॉडल की तरह काम करना होगा।
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